
महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस से जुड़ी है दीपावली की परंपरा : मुनि कमलकुमार
जैन धर्म में दीपावली का पर्व भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस अवसर पर श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, हिसार की ओर से सभी श्रद्धालुओं को दीपावली एवं भगवान महावीर निर्वाण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं दी गईं।
इस अवसर पर मुनि कमलकुमार ने भगवान महावीर के जीवन, साधना और उपदेशों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। उनका जन्म बिहार के वैशाली गणतंत्र के अंतर्गत कुंडलपुर में क्षत्रिय कुंड नगर में हुआ था। उनकी माता का नाम त्रिशला और पिता का नाम राजा सिद्धार्थ था। मान्यता के अनुसार, भगवान के गर्भकाल से ही राज्य में धन-धान्य की वृद्धि हुई और अनेक अनुकूल परिस्थितियां बनीं। इन्हीं घटनाओं को ध्यान में रखते हुए माता-पिता ने उनका नाम वर्धमान रखा।
मुनि कमलकुमार ने बताया कि भगवान महावीर ने जीवनभर वीरता और साहस का परिचय दिया, जिसके कारण वे महावीर नाम से प्रसिद्ध हुए। साधना काल में उन्होंने अनेक कठिनाइयों और कष्टों को समभाव से सहन किया। देव, मनुष्य और तिर्यंचों की ओर से आई प्रतिकूल परिस्थितियों को भी उन्होंने कर्म निर्जरा का माध्यम मानकर स्वीकार किया। उनकी साधना लगभग साढ़े बारह वर्षों तक निर्बाध रूप से चली।
उन्होंने बताया कि वैशाख शुक्ल दशमी के दिन जंभिय ग्राम में ऋजुबालिका नदी के तट पर शाल वृक्ष के नीचे साधना करते हुए भगवान महावीर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद लगभग 30 वर्षों तक उन्होंने अपनी दिव्य देशना के माध्यम से लोगों को धर्म और जीवन के सही मार्ग का संदेश दिया। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने साधु-साध्वी तथा श्रावक-श्राविका के रूप में धर्म मार्ग अपनाया।
मुनि कमलकुमार ने कहा कि भगवान महावीर ने धर्म के दो स्वरूप बताए—महाव्रत और अणुव्रत। महाव्रतों को धारण करने वाले साधु-साध्वी बने, जबकि अणुव्रतों का पालन करने वाले श्रावक-श्राविका कहलाए। भगवान महावीर ने अपनी पदयात्राओं के माध्यम से गांव-गांव पहुंचकर अहिंसा, संयम और तप का संदेश दिया। उनके उपदेश उस समय जितने प्रासंगिक थे, आज भी उतने ही उपयोगी हैं।
उन्होंने बताया कि भगवान महावीर का अंतिम प्रवास पावापुरी में हुआ। कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन उन्होंने संथारा पूर्वक अपनी अंतिम देशना दी और इसी रात्रि उनका निर्वाण हुआ। जैन परंपरा के अनुसार, भगवान के निर्वाण के अवसर पर देवों ने उत्सव मनाया और पावापुरी के लोगों ने अंधेरी रात में दीप जलाकर प्रकाश किया। इसी घटना को दीपावली के पर्व से जोड़ा जाता है।
मुनि कमलकुमार ने कहा कि वर्तमान समय में हर जगह बिजली और प्रकाश की सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में दीपावली पर दीपक और मोमबत्ती जलाते समय जीव हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से घर-घर भगवान महावीर का स्मरण और जाप करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि शारीरिक क्षमता के अनुसार तेरस, चौदस और अमावस्या पर तेला, पौषध, जप और प्रतिक्रमण जैसी धार्मिक साधनाएं करनी चाहिए। इससे कर्मों की निर्जरा के साथ जीवन में उज्ज्वलता और पवित्रता बढ़ती है।



